NDPS Act में बेल का पूरा खेल
NDPS Act, 1985 के महत्वपूर्ण कानूनी बिंदु, जिनके आधार पर कमर्शियल क्वांटिटी के मामलों में भी जमानत प्राप्त की जा सकती है।
सामान्य धारणा यह है कि यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध हेरोइन, चरस, गांजा, अफीम, एमडीएमए अथवा अन्य मादक पदार्थों की कमर्शियल क्वांटिटी की बरामदगी दर्शा दी जाए तो जमानत मिलना लगभग असंभव हो जाता है। लेकिन कानून की वास्तविक स्थिति इससे भिन्न है।
NDPS Act एक विशेष अधिनियम अवश्य है, परंतु इसके मामलों में भी अभियोजन को विधिक प्रक्रिया का पूर्णतः पालन करना अनिवार्य होता है। यदि जांच या बरामदगी की प्रक्रिया में कानूनी त्रुटियां हैं तो अभियुक्त को जमानत मिलने की पर्याप्त संभावना रहती है।
यदि कथित बरामदगी किसी सार्वजनिक स्थान से दिखाई गई है और पुलिस ने किसी स्वतंत्र व्यक्ति को गवाह नहीं बनाया है, तो बरामदगी की सत्यता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा होता है।
दण्ड प्रक्रिया संहिता (अब BNSS) की भावना यह है कि तलाशी एवं बरामदगी की कार्यवाही में स्वतंत्र गवाहों को शामिल किया जाए। कई न्यायिक निर्णयों में यह माना गया है कि स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति अभियोजन के मामले को कमजोर कर सकती है।
NDPS मामलों में धारा 42, 50, 52A, 55 एवं 57 का अनुपालन अत्यंत महत्वपूर्ण है।
यदि जांच अधिकारी इन अनिवार्य प्रावधानों का पालन नहीं करता है तो यह अभियुक्त के पक्ष में एक महत्वपूर्ण जमानत का आधार बन सकता है। सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने बार-बार कहा है कि NDPS Act के अनिवार्य प्रावधानों का कड़ाई से पालन आवश्यक है।
धारा 50 NDPS Act का सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रावधान माना जाता है।
यदि अभियुक्त को यह विधिवत जानकारी नहीं दी गई कि वह अपनी तलाशी किसी राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट के समक्ष करवा सकता है, अथवा नोटिस की प्रक्रिया संदिग्ध है, तो यह जमानत और अंतिम ट्रायल दोनों में अभियुक्त के पक्ष में मजबूत तर्क बन सकता है।
अभियोजन का यह आरोप होता है कि अभियुक्त मादक पदार्थों की खरीद-फरोख्त या परिवहन में शामिल था।
ऐसी स्थिति में जांच एजेंसी को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि कथित मादक पदार्थ कहां से प्राप्त किया गया और किसे दिया जाना था।
यदि अभियोजन इन कड़ियों को जोड़ने में असफल रहता है तथा कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, तो यह जमानत के लिए महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।
बहुत से लोग यह मान लेते हैं कि एक बार जमानत निरस्त हो जाने के बाद पुनः आवेदन नहीं किया जा सकता।
जबकि विधि का सिद्धांत यह है कि यदि परिस्थितियों में परिवर्तन हुआ है, नए तथ्य सामने आए हैं, या कोई नया न्यायिक निर्णय उपलब्ध है, तो अभियुक्त पुनः जमानत आवेदन प्रस्तुत कर सकता है।
जमानत आवेदन करना अभियुक्त का वैधानिक अधिकार है और प्रत्येक चरण पर न्यायालय से राहत मांगी जा सकती है।
निष्कर्ष
NDPS Act के मामलों में केवल बरामदगी की मात्रा ही निर्णायक नहीं होती। जांच की वैधानिकता, अनिवार्य प्रावधानों का पालन, स्वतंत्र गवाहों की उपस्थिति, धारा 50 का अनुपालन तथा अभियोजन की साक्ष्य श्रृंखला जैसे अनेक पहलू जमानत के निर्णय को प्रभावित करते हैं।
इसलिए प्रत्येक NDPS मामले का तथ्यों एवं विधिक प्रावधानों के आधार पर सूक्ष्म परीक्षण किया जाना चाहिए।
यदि आप NDPS Act से संबंधित किसी कानूनी विषय पर जानकारी चाहते हैं, तो अपने प्रश्न कमेंट में अवश्य लिखें।










