दहेज: अपराध और जवाबदेही
भूमि अधिग्रहण मामलों में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और नज़ीर स्थापित करने वाला निर्णय देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासनिक सुविधा के नाम पर नागरिकों के वैधानिक अधिकारों का हनन स्वीकार्य नहीं है।
जस्टिस संगीता चंद्रा और जस्टिस बृज राज सिंह की खंडपीठ ने अपने निर्णय में कहा कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 की धारा 17 (तत्कालता प्रावधान) का प्रयोग केवल वास्तविक, असाधारण एवं प्रमाणित आपात परिस्थितियों में ही किया जा सकता है।
न्यायालय ने यह विधिक प्रतिपादित किया कि केवल प्रशासनिक आवश्यकता या परियोजना में संभावित विलंब को ‘तत्कालता’ का आधार नहीं माना जा सकता। यदि अधिसूचना में ठोस, स्पष्ट एवं वस्तुनिष्ठ कारणों का अभाव है, तो ऐसी कार्रवाई मनमानी (arbitrary) एवं विधि विरुद्ध मानी जाएगी।
याचिकाकर्ता का पक्ष:
मामले में याचिकाकर्ता ने यह अभ्यावेदन प्रस्तुत किया कि बिना किसी वास्तविक आपात स्थिति के धारा 17 भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 लागू कर उनके धारा 5-ए भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के तहत आपत्ति दर्ज कराने के मौलिक वैधानिक अधिकार को समाप्त कर दिया गया, जो कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों (Principles of Natural Justice) का प्रत्यक्ष उल्लंघन है।
कोर्ट की टिप्पणी:
माननीय न्यायालय ने अपने आदेश में कहा—
“सिर्फ प्रशासनिक सुविधा या आवश्यकता, ‘तत्कालता’ की वैधानिक कसौटी को संतुष्ट नहीं करती। बिना ठोस कारणों के इस प्रावधान का प्रयोग कानूनी दुरुपयोग (misuse of power) की श्रेणी में आएगा।”
अदालत ने यह भी प्रतिपादित किया कि धारा 17 एक अपवादात्मक शक्ति (exceptional power) है, जिसका प्रयोग अत्यंत सीमित एवं विवेकपूर्ण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए, क्योंकि इसके प्रयोग से भूमि स्वामी के महत्वपूर्ण अधिकारों का हनन होता है।
अन्य महत्वपूर्ण निष्कर्ष:
न्यायालय ने पाया कि—
संवैधानिक पहलू:
न्यायालय ने अनुच्छेद 300-ए भारतीय संविधान का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी व्यक्ति को उसकी संपत्ति से केवल विधि द्वारा ही वंचित किया जा सकता है। प्रक्रिया का अनुपालन न होने पर अधिग्रहण असंवैधानिक (unconstitutional) घोषित किया जाएगा।
पूर्ववर्ती निर्णय का हवाला:
कोर्ट ने ओम प्रकाश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के निर्णय का संदर्भ देते हुए पुनः स्पष्ट किया कि योजनाबद्ध विकास अपने आप में ‘तत्कालता’ का वैध आधार नहीं बन सकता।
अंतिम आदेश:
न्यायालय ने संपूर्ण अधिग्रहण एवं उससे संबंधित नीलामी कार्यवाही को अवैध, मनमाना एवं शून्य (void) घोषित करते हुए निरस्त कर दिया। साथ ही निर्देश दिया कि विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप धनराशि जमा होने पर भूमि याचिकाकर्ता को पुनः सुपुर्द (restore) की जाए।
यदि FIR में अभियुक्त की भूमिका स्पष्ट नहीं है या केवल सामान्य/रूटीन भाषा में नाम जोड़ा गया है, तो यह जमानत के लिए मजबूत आधार हो सकता है।
यदि घटना में अभियुक्त की संलिप्तता को प्रमाणित करने वाले कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य (Direct Evidence) नहीं हैं — जैसे CCTV, गवाह, मोबाइल लोकेशन आदि — तो यह जमानत का मजबूत आधार होता है।
यदि सह-आरोपी को पहले ही जमानत मिल चुकी है, और अभियुक्त की भूमिका भी उतनी ही संदिग्ध है, तो समानता का लाभ मिल सकता है।
जब जाँच में अब तक कोई ठोस तथ्य नहीं आया है, तो संदेहपूर्ण आधार पर जमानत देना उचित माना जाता है।
अगर पीड़ित के बयान और मेडिकल साक्ष्य/गवाहियों में अंतर है, तो मामला संदेहपूर्ण मा
ना जाएगा — और अभियुक्त को जमानत का लाभ मिल सकता है।
पहली बार अपराध में लिप्त व्यक्ति को कठोर दृष्टिकोण से नहीं देखा जाता।
सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों में कहा गया है कि:
महिला, गर्भवती, वृद्ध या बीमार अभियुक्त को जेल में रखना अत्यधिक कठोरता हो सकती है, इसलिए जमानत देना उपयुक्त होगा।
जहाँ अभियुक्त (Accused) की गिरफ्तारी (Arrest) किए बिना ही पुलिस द्वारा आरोप-पत्र (Charge-sheet) प्रस्तुत कर दिया गया हो, वहाँ अभियुक्त को न्यायिक अभिरक्षा (Judicial Custody) में भेजना आवश्यक नहीं है। Smt. Bacchi Devi v. State of U.P. (2026)
गिरफ्तारी का अभाव (Absence of Arrest):
यदि विवेचना के दौरान अभियुक्त की गिरफ्तारी नहीं की गई और वह स्वतंत्र रहा, तो आरोप-पत्र दाखिल होने के पश्चात उसे स्वतः हिरासत में भेजना न्यायसंगत नहीं है।
न्यायिक अभिरक्षा की अनिवार्यता नहीं (No Mandatory Remand):
केवल इस आधार पर कि आरोप-पत्र न्यायालय में प्रस्तुत हुआ है, अभियुक्त को न्यायिक अभिरक्षा में भेजना (Remand to Judicial Custody) विधि सम्मत नहीं है।
जमानत बंधपत्र पर्याप्त (Bail Bond Suffices):
अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करने हेतु जमानत बंधपत्र (Bail Bond) प्रस्तुत करना ही पर्याप्त है।
न्यायालय अभियुक्त से धारा 170 CrPC Section 170 के अंतर्गत प्रस्तुत होने की अपेक्षा कर सकता है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि उसे अनिवार्य रूप से हिरासत में लिया जाए।
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि आरोप-पत्र दाखिल होना अपने-आप में हिरासत का आधार नहीं है, विशेषकर तब जब अभियुक्त पहले से स्वतंत्र रहा हो।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 110, तथा 111 से संबंधित विधिक सिद्धांतों
धारा 110 के अनुसार सामान्य विधिक अनुमान (Presumption) यह है कि यदि कोई व्यक्ति 30 वर्ष के भीतर जीवित था, तो उसे जीवित ही माना जाएगा, जब तक कि उसके मृत होने का प्रमाण प्रस्तुत न किया जाए।
धारा 111 इस नियम का अपवाद (Exception) है। यदि कोई व्यक्ति सात वर्षों तक उन लोगों द्वारा नहीं सुना गया जो सामान्यतः उसके बारे में सुनते, तो न्यायालय यह अनुमान कर सकता है कि वह व्यक्ति मृत हो चुका है।
●✒ किन्तु यह अनुमान केवल मृत्यु के तथ्य (Fact of Death) तक सीमित है।
●✒ इससे यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वह व्यक्ति कब मरा।
●✒ न ही यह माना जा सकता है कि वह सात वर्ष पहले ही मर गया था या गायब होने के तुरंत बाद उसकी मृत्यु हो गई थी।
यदि किसी वाद में मृत्यु की तिथि या समय (Date or Time of Death) विवाद का विषय हो, तो उसका निर्धारण केवल प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Direct or Circumstantial Evidence) के आधार पर ही किया जा सकता है।
●✒ जो पक्ष यह दावा करता है कि व्यक्ति की मृत्यु किसी विशेष तिथि या समय पर हुई, उस पर ही उस तथ्य को सिद्ध करने का प्रमाण भार (Burden of Proof) रहेगा।
●✒ धारा 111 केवल इतना प्रभाव डालती है कि जब सात वर्षों तक कोई व्यक्ति नहीं सुना गया हो, तब जीवित होने का दावा करने वाले व्यक्ति पर प्रमाण का भार स्थानांतरित हो जाता है।
जिला न्यायाधीश (District Judge) केवल इस आधार पर कि धारा 111 लागू होती है, यह घोषणा (Declaration) नहीं कर सकता कि व्यक्ति किस तिथि को मरा।
धारा 111 के अंतर्गत अधिकतम यह अनुमान लगाया जा सकता है कि—
●✒ व्यक्ति मृत हो चुका है, परन्तु मृत्यु की सटीक तिथि या समय का निर्धारण नहीं किया जा सकता।
धारा 111 BSA या सामान्य तर्क के आधार पर यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि—
●✒ व्यक्ति गायब होने की तिथि पर ही मर गया, या
●✒ उसके तुरंत बाद उसकी मृत्यु हो गई।
●✒ मृत्यु का वास्तविक समय साक्ष्य से सिद्ध किया जाना आवश्यक है, और उसका भार उस व्यक्ति पर रहेगा जो उस तथ्य का दावा करता है।
●✒ यदि कोई बीमित व्यक्ति सात वर्षों से लापता हो और उसके बारे में कोई सूचना न हो, तो न्यायालय यह मान सकता है कि वह मृत है, परन्तु—
●✒ यह नहीं माना जा सकता कि उसकी मृत्यु गायब होने की तिथि पर ही हुई।
●✒ यदि बीमा पॉलिसी प्रीमियम न देने के कारण समाप्त हो चुकी हो, तो दावेदार को पूरी बीमा राशि नहीं, बल्कि केवल Paid-up value का ही अधिकार मिलेगा।
यदि साक्षियों के बयान से यह सिद्ध हो जाए कि कोई व्यक्ति 35–40 वर्षों से दिखाई या सुना नहीं गया, तो न्यायालय सुरक्षित रूप से यह अनुमान लगा सकता है कि वह व्यक्ति मृत है, और ऐसी स्थिति में धारा 110 और 111 दोनों लागू होंगी।
धारा 110 – कब्जे के आधार पर स्वामित्व का अनुमान
धारा 110 का सिद्धांत यह है कि दीर्घकालिक और शांतिपूर्ण कब्जा (Long, Peaceful and Settled Possession) संपत्ति पर स्वामित्व का प्रथमदृष्टया प्रमाण (Prima Facie Evidence of Title) माना जाता है।
यदि कोई व्यक्ति लंबे समय से संपत्ति पर काबिज है, तो—
●✒ यह अनुमान लगाया जाएगा कि वही उसका वास्तविक स्वामी (Owner) है।
●✒ इसके विपरीत सिद्ध करने का भार प्रतिवादी पर स्थानांतरित हो जाता है।
यदि वादी ने स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) के लिए वाद दायर किया हो और अभिलेखों से यह सिद्ध हो जाए कि—
●✒ वादी का संपत्ति पर लंबे समय से शांतिपूर्ण और स्थायी कब्जा है,
●✒ प्रतिवादी यह सिद्ध नहीं कर पाता कि वह भूमि सरकारी या उसकी स्वयं की है,
●✒ तो न्यायालय कब्जे के आधार पर स्वामित्व का अनुमान वादी के पक्ष में लगाकर प्रतिवादी को वादकारियों को बेदखल करने से रोक सकता है।
भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित मौलिक अधिकार है। इसी अधिकार की सुरक्षा के लिए D.K. Basu v. State of West Bengal में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने गिरफ्तारी और हिरासत के दौरान पुलिस अधिकारियों के लिए कुछ अनिवार्य प्रक्रियात्मक दिशानिर्देश (Mandatory Procedural Safeguards) निर्धारित किए।
● गिरफ्तारी करने तथा पूछताछ करने वाले सभी पुलिस कर्मियों के पास स्पष्ट पहचान-पत्र एवं नाम-पट्ट (Name Tag) होना अनिवार्य है।
साथ ही, पूछताछ में शामिल प्रत्येक अधिकारी का विवरण आधिकारिक रजिस्टर में अंकित किया जाना आवश्यक है, ताकि जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
गिरफ्तारी के समय पुलिस अधिकारी को तत्काल “गिरफ्तारी मेमो” तैयार करना होगा।
यह मेमो—
● कम से कम एक स्वतंत्र गवाह द्वारा सत्यापित होना चाहिए,
● गवाह परिवार का सदस्य या स्थानीय सम्मानित व्यक्ति हो सकता है,
● मेमो पर गिरफ्तार व्यक्ति के हस्ताक्षर भी आवश्यक होंगे,
● तथा उसमें गिरफ्तारी की तिथि और समय स्पष्ट रूप से अंकित होना चाहिए।
● गिरफ्तार व्यक्ति को यह विधिक अधिकार है कि उसके किसी मित्र, रिश्तेदार या हितैषी को गिरफ्तारी की सूचना दी जाए।
● यदि गिरफ्तारी मेमो का गवाह वही व्यक्ति है, तो अलग से सूचना देना आवश्यक नहीं होगा।
यदि गिरफ्तार व्यक्ति का निकट संबंधी किसी अन्य जिले या नगर में रहता है, तो पुलिस को 8 से 12 घंटे के भीतर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण या संबंधित पुलिस स्टेशन के माध्यम से टेलीग्राफिक/संदेश द्वारा सूचना देना अनिवार्य है।
गिरफ्तारी के तुरंत बाद पुलिस अधिकारी का दायित्व है कि वह गिरफ्तार व्यक्ति को उसके इस अधिकार के बारे में अवगत कराए कि वह अपने किसी परिचित को सूचना दिलवा सकता है।
हिरासत स्थल की केस डायरी या जनरल डायरी में गिरफ्तारी की प्रविष्टि करना अनिवार्य है।
इस प्रविष्टि में—
● सूचना प्राप्त करने वाले परिजन का नाम,
● हिरासत में रखने वाले पुलिस अधिकारियों का विवरण स्पष्ट रूप से दर्ज होना चाहिए।
● यदि गिरफ्तार व्यक्ति ऐसा अनुरोध करता है, तो गिरफ्तारी के समय उसका चिकित्सकीय परीक्षण किया जाना चाहिए।
● उसके शरीर पर मौजूद छोटी या बड़ी सभी चोटों का विवरण “इंस्पेक्शन मेमो” में दर्ज किया जाएगा, जिस पर—
पुलिस अधिकारी और गिरफ्तार व्यक्ति दोनों के हस्ताक्षर होंगे।
हिरासत के दौरान गिरफ्तार व्यक्ति का हर 48 घंटे में एक अधिकृत चिकित्सक द्वारा मेडिकल परीक्षण किया जाना अनिवार्य है, जिसे राज्य के स्वास्थ्य निदेशक द्वारा स्वीकृत डॉक्टरों के पैनल से नियुक्त किया गया हो।
गिरफ्तारी से संबंधित सभी दस्तावेज—विशेषकर गिरफ्तारी मेमो—की प्रतिलिपि संबंधित इलाका मजिस्ट्रेट (Illaqa Magistrate) को रिकॉर्ड हेतु भेजी जानी चाहिए।
पूछताछ के दौरान गिरफ्तार व्यक्ति को अपने अधिवक्ता से मिलने की अनुमति दी जा सकती है, यद्यपि यह अनुमति पूरे समय पूछताछ के दौरान निरंतर उपस्थित रहने के रूप में नहीं होगी।
प्रत्येक जिला एवं राज्य मुख्यालय में पुलिस कंट्रोल रूम स्थापित होना चाहिए, जहाँ गिरफ्तारी करने वाला अधिकारी 12 घंटे के भीतर गिरफ्तारी और हिरासत स्थल की सूचना उपलब्ध कराए और उसे नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित किया जाए।
उल्लंघन की विधिक परिणति
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यदि इन दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया जाता, तो संबंधित पुलिस अधिकारी के विरुद्ध—
● विभागीय कार्यवाही (Departmental Action)
● तथा न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court) की कार्यवाही की जा सकती है, और ऐसी अवमानना की कार्यवाही किसी भी सक्षम उच्च न्यायालय में संस्थित की जा सकती है।
● ये दिशानिर्देश न केवल गिरफ्तारी की प्रक्रिया को विधिसम्मत बनाते हैं, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा और पुलिस जवाबदेही सुनिश्चित करने का संवैधानिक तंत्र भी स्थापित करते हैं।
सामान्य विधिक गलतियों का विश्लेषण , जो धारा 69 BNS के अंतर्गत दर्ज FIR के पश्चात् पुरुषों द्वारा की जाती हैं, तथा जिनके कारण सुदृढ़ प्रतिरक्षा (Defence) भी दुर्बल हो जाती है।
अनेक आरोपी घबराहटवश, अप्रामाणिक सलाह पर निर्भर होकर अथवा भावनात्मक आवेग में ऐसे कदम उठा लेते हैं, जो उनकी विधिक प्रतिरक्षा को स्थायी क्षति पहुँचा देते हैं।
गलतियों पर चर्चा से पूर्व विधिक स्पष्टता आवश्यक है—
इसके बावजूद अनेक निर्दोष पुरुष टाली जा सकने वाली गलतियों के कारण विधिक आधार (Legal Ground) खो देते हैं।
यदि धारा 69 BNS के अंतर्गत “विवाह का झूठा वादा” (False Promise to Marry) कर यौन संबंध स्थापित के आरोप में FIR दर्ज हुई है, तो भारतीय विधि के अधीन अपने अधिकारों की रक्षा हेतु निम्नलिखित गलतियों से बचना अत्यावश्यक है—
यह सबसे गंभीर त्रुटि है।
अनेक पुरुष यह मान लेते हैं कि चूँकि संबंध सहमति से था, अतः विधि स्वतः उनका संरक्षण करेगी। यह धारणा अत्यंत जोखिमपूर्ण है।
FIR के स्तर पर पुलिस आशय (Intention) की गहन परीक्षा नहीं करती; यह परीक्षण न्यायालय द्वारा किया जाता है।
यदि अभियुक्त यह सोचकर विधिक कार्यवाही में विलंब करता है कि सत्य स्वयं प्रकट हो जाएगा, तो वह गिरफ्तारी, दमनात्मक अन्वेषण (Coercive Investigation) तथा अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) के अवसर की हानि का जोखिम उठाता है।
धारा 69 BNS एक गंभीर एवं साधारण प्रकृति का अपराध नहीं है।
अनेक पुरुष पुलिस नोटिस अथवा मौखिक आश्वासन की प्रतीक्षा करते रहते हैं। यह विलंब अभियोजन को रणनीतिक लाभ प्रदान करता है।
अग्रिम जमानत अपराध स्वीकारोक्ति (Admission of Guilt) नहीं है; यह एक संवैधानिक संरक्षण (Constitutional Protection) है। विलंब अभियुक्त की विश्वसनीयता को क्षीण करता है तथा अभियोजन के कथन को सुदृढ़ करता है।
अनेक अभियुक्त पुलिस के समक्ष “पूरी बात स्पष्ट करने” का प्रयास करते हैं।
अधिकांशतः यह कदम प्रतिकूल सिद्ध होता है।
पुलिस कथन सदैव निष्पक्ष भाषा में अभिलेखित हों, यह सुनिश्चित नहीं है। भावनात्मक स्पष्टीकरण, स्वीकारोक्ति सदृश कथन अथवा संबंध के विवरण बाद में चयनात्मक रूप से अभियुक्त के विरुद्ध प्रयुक्त किए जा सकते हैं।
अभियुक्त का पक्ष विधिक अधिवक्ता के माध्यम से सुविचारित ढंग से प्रस्तुत किया जाना चाहिए, न कि आवेग में।
फोन कॉल, संदेश अथवा प्रत्यक्ष “समझौता” का प्रयास गंभीर विधिक भूल है।
इसके परिणामस्वरूप—
सद्भावनापूर्ण संवाद भी विधिक रूप से भिन्न अर्थ ग्रहण कर सकता है।
भय अथवा लज्जा के कारण डिजिटल सामग्री हटाना अत्यंत गंभीर त्रुटि है।
धारा 69 BNS के प्रकरणों में डिजिटल आचरण प्रायः अभियुक्त की सबसे सशक्त प्रतिरक्षा सिद्ध होता है। साक्ष्य हटाने से अभियोजन को प्रतिकूल अनुमान (Adverse Inference) तथा मनगढ़ंत आरोप (Fabrication) का तर्क प्रस्तुत करने का अवसर मिल जाता है।
साक्ष्य का संरक्षण ही विधिक संरक्षण है।
अनेक पुरुष FIR के पश्चात् मानसिक रूप से पराजय स्वीकार कर लेते हैं।
यह भय उन्हें जल्दबाजी में समझौता, बाध्य विवाह अथवा असत्य स्वीकारोक्ति जैसे कदम उठाने हेतु प्रेरित करता है।
वास्तविकता यह है कि “विवाह के झूठे वादे” के प्रकरणों में दोषसिद्धि दर निम्न रहती है, विशेषकर तब जब—
भय आधारित निर्णय अन्यथा बचाव योग्य प्रकरण को नष्ट कर देते हैं।
कुछ अभियुक्त बिना विधिक रणनीति के शीघ्रता में निरस्तीकरण याचिका दायर कर देते हैं।
दुर्बल रूप से प्रारूपित याचिका न्यायालय द्वारा अस्वीकृत होने पर भविष्य की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न कर सकती है।
निरस्तीकरण, विशेषतः अनुच्छेद 226 के अंतर्गत अथवा दण्ड प्रक्रिया से संबंधित प्रावधानों के अधीन, निम्न बिंदुओं पर सटीक अभिकथन (Precise Pleading) अपेक्षित करता है—
समय एवं प्रारूपण (Drafting) अत्यंत निर्णायक हैं।
जब मानसिक संतुलन प्रभावित होता है, तो विधिक प्रतिरक्षा भी दुर्बल हो जाती है।
असत्य आरोपों के आघात को कम आँकना, कार्यक्षमता में गिरावट तथा वाद-प्रक्रिया में असंगति उत्पन्न करता है।
न्यायालय आचरण एवं स्थिरता का अवलोकन करता है। संयम एवं निरंतरता विश्वसनीयता को सुदृढ़ करते हैं।
पेशेवर एवं विधिक सहायता प्राप्त करना दुर्बलता नहीं, बल्कि रणनीति है।
धारा 69 BNS एक गंभीर विधिक प्रावधान है, किन्तु इसका उद्देश्य असफल संबंधों को अपराध घोषित करना नहीं है।
अधिकांश पुरुष इसलिए पराजित नहीं होते कि विधि उनके प्रतिकूल है, बल्कि वे प्रारम्भिक चरण में भय, लज्जा अथवा भ्रान्त जानकारी के कारण रणनीतिक त्रुटियाँ कर बैठते हैं।
यदि आप धारा 69 BNS के अंतर्गत FIR का सामना कर रहे हैं—
आपकी चुप्पी, घबराहट अथवा आवेगपूर्ण प्रतिक्रिया आरोप से अधिक गंभीर क्षति पहुँचा सकती है।
प्रत्येक धारा 69 BNS प्रकरण तथ्यों एवं परिस्थितियों पर आधारित होता है।
Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1985 की धारा 35 के अंतर्गत mens rea (अपराधात्मक मानसिक तत्व) के संबंध में न्यायालय एक वैधानिक अनुमान (presumption) ग्रहण करता है कि अभियुक्त को मादक पदार्थ की प्रकृति एवं उपस्थिति का ज्ञान था।
अतः एक बार कब्जा (possession) सिद्ध हो जाने पर, अभियुक्त पर यह भार स्थानांतरित (reverse burden) हो जाता है कि वह यह सिद्ध करे कि—
अभियुक्त निम्न प्रकार से अपना भार निर्वहन कर सकता है—
महत्वपूर्ण सिद्धांत:
अभियुक्त को अपने बचाव में अनिवार्यतः पृथक साक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं है। यदि अभियोजन के ही साक्ष्य से ऐसी परिस्थितियाँ उभरती हैं जिससे न्यायालय को यह युक्तिसंगत आश्वासन (reasonable assurance) प्राप्त हो कि अभियुक्त को पदार्थ की जानकारी नहीं थी, तो धारा 35 का अनुमान खंडित (rebutted) माना जाएगा।
यदि अभियुक्त यह स्वीकार करता है कि—
तो प्रथम दृष्टया कब्जा सिद्ध होता है।
अब यह सिद्ध करने का भार अभियुक्त पर है कि—
यदि—
तो इन परिस्थितियों से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अभियुक्त ने धारा 35 के अधीन अनुमान का सफलतापूर्वक खंडन कर दिया है।
अर्थात् अभियुक्त द्वारा संदेह की युक्तिसंगत संभावना (preponderance of probability) स्थापित कर देना पर्याप्त है; उसे अभियोजन की भाँति संदेह से परे (beyond reasonable doubt) सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है।
"परिस्थितियों की श्रृंखला (chain of circumstances) पूर्ण, अविच्छिन्न तथा अभियुक्त की दोषसिद्धि की ओर ही संकेत करने वाली होनी चाहिए।"
इस प्रकरण में यह तथ्य निर्विवाद रूप से सिद्ध हुआ कि अभियुक्त-पति की दो पत्नियाँ थीं तथा वह मृतका (प्रथम पत्नी) के साथ निरंतर क्रूरता एवं उत्पीड़न करता था। साक्ष्यों से यह भी प्रमाणित हुआ कि अभियुक्त द्वारा मृतका को कई बार जान से मारने की धमकी दी गई थी, जो कि उसके दुष्प्रेरक आशय (motive) को स्पष्ट रूप से स्थापित करता है।
उक्त प्रकरण में अभियोजन का संपूर्ण मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था, जहाँ प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य का अभाव था।
घटना की रात अभियुक्त एवं मृतका दोनों ने साथ-साथ सिनेमा का द्वितीय शो देखा, तत्पश्चात दोनों अपने आवासीय गृह में लौटे और वहीं रात्रि विश्राम किया। अगले प्रातः मृतका को उसी घर में मृत अवस्था में पाया गया। पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट के अनुसार मृतका की मृत्यु का कारण गला दबाकर हत्या (strangulation) था, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि मृत्यु हत्या (homicidal death) थी, न कि आकस्मिक अथवा आत्महत्या।
अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि अभियुक्त ने पुलिस को दी गई सूचना में यह उल्लेख नहीं किया कि घटना के समय घर में कोई अन्य व्यक्ति भी उपस्थित था। साथ ही, अभियुक्त द्वारा यह स्पष्ट करने हेतु कोई भी संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया कि उसकी पत्नी की हत्या कैसे और किन परिस्थितियों में हुई।
ऐसी स्थिति में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 लागू होती है, जिसके अनुसार वे तथ्य जो विशेष रूप से अभियुक्त के ज्ञान में हों, उनका स्पष्टीकरण देना अभियुक्त का दायित्व होता है। अभियुक्त द्वारा इस दायित्व का निर्वहन न किया जाना अभियोजन की परिस्थितियों की श्रृंखला में एक अतिरिक्त एवं सुदृढ़ कड़ी (additional link) के रूप में माना गया।
अतः न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत परिस्थितियाँ पूर्णतः सिद्ध हैं, परस्पर संगत हैं तथा केवल अभियुक्त की दोषसिद्धि की ओर ही संकेत करती हैं। इस प्रकार अभियुक्त की संलिप्तता संदेह से परे (beyond reasonable doubt) सिद्ध हुई और इसलिए अभियुक्त को धारा 302 भा.दं.सं. के अंतर्गत दोषी ठहराया जाना विधिसम्मत एवं न्यायोचित माना गया।
यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को किसी भी माध्यम से निम्न प्रकार की धमकी देता है—
● उसके शरीर (Person) को क्षति पहुँचाने की,
● उसकी प्रतिष्ठा (Reputation) को हानि पहुँचाने की,
● उसकी संपत्ति (Property) को नुकसान पहुँचाने की,
● या ऐसे किसी व्यक्ति के शरीर अथवा प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचाने की, जिसमें वह व्यक्ति विधिक अथवा सामाजिक रूप से रुचि (Interested Person) रखता हो, और ऐसी धमकी देने का उद्देश्य—
● उस व्यक्ति के मन में भय या आतंक उत्पन्न करना, या
● उसे ऐसा कोई कार्य करने के लिए बाध्य करना, जिसे वह कानूनन करने के लिए बाध्य नहीं है, या
● उसे ऐसा कोई वैध कार्य न करने के लिए विवश करना, जिसे वह कानूनन करने का अधिकार रखता है,
तो ऐसा कृत्य आपराधिक भयादोहन की श्रेणी में आता है।
यदि किसी व्यक्ति को इस आशय से धमकी दी जाती है कि किसी ऐसे मृत व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाया जाएगा, जिससे वह व्यक्ति भावनात्मक, पारिवारिक या सामाजिक रूप से जुड़ा हुआ है, तो वह भी इस धारा के अंतर्गत आपराधिक भयादोहन माना जाएगा। धारा 351 BNS – (Criminal Intimidation)
धारा 351(1) के अंतर्गत दोषसिद्ध होने पर अभियुक्त को—
● दो वर्ष तक का कारावास, या
● अर्थदंड, या
● दोनों से दंडित किया जा सकता है।
यदि धमकी निम्न में से किसी आशय से दी जाए—
● मृत्यु कारित करने की,
● गंभीर चोट (Grievous Hurt) पहुँचाने की,
● आग लगाकर संपत्ति नष्ट करने की,
● ऐसे अपराध की, जो मृत्युदंड, आजीवन कारावास, अथवा सात वर्ष तक के कारावास से दंडनीय हो,
● अथवा किसी स्त्री की शीलभंग/असतीत्व (Unchastity) का आरोप लगाने की,
तो ऐसे अपराध के लिए—
● सात वर्ष तक का कारावास,
● या अर्थदंड,
● या दोनों का प्रावधान है।
यदि आपराधिक भयादोहन—
तो अभियुक्त को उपधारा (1) में वर्णित दंड के अतिरिक्त,
(Intentional Insult with Intent to Provoke Breach of Peace)
यदि कोई व्यक्ति—
तो ऐसा कृत्य धारा 352 के अंतर्गत दंडनीय अपराध होगा।
इस धारा के अंतर्गत दोषसिद्ध होने पर अभियुक्त को—
● दो वर्ष तक का कारावास,
● या अर्थदंड,
● या दोनों से दंडित किया जा सकता है।
⚖️ दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 दहेज लेना-देना सिर्फ सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि गंभीर दंडनीय अपराध , मांग की तो जेल तय! विज्ञापन द...